Wednesday, April 14, 2010

नीद से लड़ते हुए जब थकी-हारी

फिर नीद आ जाती है

सपना देखना मेरा तुम्हें जाहिर हो

इसलिये बड़बड़ाती हूँ

.

रक्तपिपासु घूमते है निर्द्वन्द

देखकर डर जाती हूँ

फिर जन्मने की ख्वाहिश में

अक्सर मैं मर जाती हूँ

10 comments:

Suman said...

nice

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा अभिव्यक्ति.

अजय कुमार झा said...

दोनों ही टुकडे बहुत खूबसूरत बन पडे हैं । शुभकामनाएं

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संजय भास्कर said...

हमेशा की तरह उम्दा रचना..बधाई.

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

बहुत ही सुन्दर रचना हैं ! दोनों ही कविता अच्छी है !

neelima garg said...

interesting...

आदित्य आफ़ताब "इश्क़" said...

..अभिव्यक्ति का ज़ाहिर होना इसे ही कहते हैं ....................बहस प्रभावपूर्ण

kshama said...

रक्तपिपासु घूमते है निर्द्वन्द

देखकर डर जाती हूँ

फिर जन्मने की ख्वाहिश में

अक्सर मैं मर जाती हूँ...
In diggajon ke baad mai kya kahun?Waisebhi aapki aakhari do panktiyon ne mujhe nishabd kar diya..

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

नीद से लड़ते हुए जब थकी-हारी

फिर नीद आ जाती है

सपना देखना मेरा तुम्हें जाहिर हो

इसलिये बड़बड़ाती हूँ


waaaaaahhhhhhhhh...kitni pyaari baat kahi hai aapne...lazawaab

हमारीवाणी

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