Saturday, April 24, 2010

लोग चिल्ला रहे थे. वह भी चिल्ला रहा था. लोग गालियाँ सुना रहे थे. वह भी गालियाँ सुना रहा था.

मैनें कहा : इंसान ऐसे होते हैं.

लोग चिल्ला रहे थे. वह शांत था. लोग गालियाँ सुना रहे थे. वह मुस्करा रहा था..

मैनें कहा : इंसान ऐसे भी होते हैं

वह चिल्ला रहा था. लोग शांत थे. वह  गालियाँ सुना रहा था. लोग मुस्करा रहे थे.

मैनें कहा : इंसान ऐसे भी होते हैं

11 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

मानसिकता पर सुन्दर पोस्ट है!

श्यामल सुमन said...

हाँ सचमुच इन्सान ऐसे ही होते हैं। अच्छे भाव की प्रस्तुति।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

कविता रावत said...

Insanon ki sabhi variety maujood hai...
bus yadi insaan insaan bana rahe to sabko hi achha lagta hai,, vrana kise bhaata hai.....
bahut achhi post.
Haardik shubhkaamnayne

Jyoti said...

वह शांत था. लोग गालियाँ सुना रहे थे. वह मुस्करा रहा था.......
बहुत सुन्दर लघु कथा.............

mridula pradhan said...

bahut achchi lagi.

राकेश कौशिक said...

मनुष्यता के अलग-अलग रूपों को व्यक्त करती रचना अच्छी लगी

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सच कहा आपने।
--------
गुफा में रहते हैं आज भी इंसान।
ए0एम0यू0 तक पहुंची ब्लॉगिंग की धमक।

Udan Tashtari said...

सच, इन्सान ऐसे भी होते हैं.

Shekhar Kumawat said...

bahtrin

bahut badhai

shekhar kumawat

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

waah insaan kai kismon se mulaqaat karwa di aapne..sundar prastuti

संजय भास्कर said...

सच कहा आपने।

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