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Monday, April 5, 2010

कुछ कारणो से लम्बे समय से ब्लागजगत से दूर रही. आज एक रचना के साथ लौट रही हूँ.

चलो धूप से बात करें

अब तो शुभ प्रभात करें

.

रिश्ता-रिश्ता स्पर्श करें

अब तो ना आघात करें

.

सुनियोजित करते ही हैं

कुछ तो अकस्मात करें

.

तेरे-मेरे अपने है-सपने

फिर किसका रक्तपात करें

.

नेह का प्यासा अंतर्मन

कोई नया सूत्रपात करें

Tuesday, August 4, 2009
**
कुछ रिश्ते उधार के होते हैं
कुछ रिश्ते प्यार के होते हैं

इतनी बेरूखी अच्छी नहीं है
कुछ रिश्ते इंतज़ार के होते हैं

टूट जाते हैं पल में देखो तो
कुछ रिश्ते तार के होते हैं

नाज़ुक फूल, कब उफ किया!
कुछ रिश्ते खा़र के होते हैं

बिक गये पर इतनी हैरानी क्यूँ
कुछ रिश्ते व्यापार के होते हैं
Monday, July 13, 2009

जाने कितने सपने पालता है मन
फिर सपनों को खंगालता है मन

नाज़ुक इतना कि टूटता रहता है
खुद ही को फिर संभालता है मन

खुद ही के खिलाफ बयान देकर
अपना भडा़स निकालता है मन

कभी बच्चों सा मचल जाता है
कभी हर बात को टालता है मन


आसमान छूने की आरज़ू इसकी
गेंद सा खुद को उछालता है मन
Tuesday, June 9, 2009


सच्चाई को कहना सीखो
सच्चाई को सहना सीखो

बुलंदी
के अभिलाषी हैं तो
कभी
कभार ढहना सीखो

उजड़
गए हैं घर तो क्या
चौराहों
पर रहना सीखो

पत्थर
-पत्थर छूकर गुज़रो
पानी
-पानी बहना सीखो
Friday, June 5, 2009

उजाड़कर बस्ती शोक मनाते हैं
कत्ल करके फिर आंसू बहाते हैं
.
गुमशुदा तलाश में पढ़कर नाम
ख़ुद ही को लोग ढूढ़ने जाते हैं
.
ख़ुद के चेहरों पर लगा कर दाग
आईनों पर देखिये कहर ढाते हैं
.
इस बस्ती से बेखौफ न गुज़रिये
बात-बात पे लोग खंज़र उठाते हैं
.
मज़हबी शिकंजे में जकडे़ ये लोग
फख्र से आज़ादी के गीत गाते हैं

हमारीवाणी

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